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Friday, April 8, 2016

गंगाष्टकम्

       (श्री शंकराचार्यविरचितम्)

भगवति तव तीरे नीरमात्राशनॊऽहं विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि।
सकलकलुषभङ्गे स्वर्गसोपानसङ्गे तरलतरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद॥१॥

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम


अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते 
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

Sunday, December 20, 2015

शिव मानस पूजा


रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम
जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌ 1

वेदसार शिवस्तवः


पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
      गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
      महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ।।।।

लिङ्गाष्टक स्तोत्रम्‌


ब्रह्म मुरारि सुरार्चितलिङ्गं निर्म्मल भासित शोभित लिङ्गम्‌
जन्मज दु:ख विनाशक लिङ्गं तत्‌ प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् 1

देवमुनि प्रवरार्च्चित लिङ्गं कामदहं करूणाकर लिङ्गम्
रावणदर्प विनाशन लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् 2

शिव ताण्डव स्तोत्र


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
      गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
      चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥१॥

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी
      विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
      किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥

रुद्राष्टकम्


नमामीशमीशान निर्वाणरूपम् । विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पनिरीह चिदाकाशमाकाशवासम् भजेऽह ॥१॥

निराकारमोङ्कारमूलम् तुरीयम् । गिराज्ञानगोतीतमीशम् गिरीशम् ।
करालमहाकाल कालकृपालं  गुणागारसंसारपारम् नतोऽहम् ॥२॥

श्री रामचंद्र जी


आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं
वैदेहीहरणं   जटायुमरणं   सुग्रीव  संभाषणं
बालिनिग्रहणं   समुद्रतरणं  लङ्कापुरीदाहनम्
पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि    रामायण ।।